न्यूज़ बिहार डेस्क, आरा : प्रारब्ध : आरा के चन्दवा में चल रहे चातुर्मास यज्ञ में संत श्री जियर स्वामी ने कहा कि साठ वर्ष की आयु में पुत्रों को सौंप दे जिम्मेवारी। आगे स्वामी जी कहते हैं निराकार और साकार रूप तत्त्वतः एक है। विद्या को कभी विवाद का कारण न बनायें। दूसरे के अहित के लिये किया गया व्यवहार ही निकृष्ट क्रोध है। जिससे अपना न लाभ हो न हानि परन्तु दूसरे का नुकसान हो, वही कार्य क्रोध है। जो क्रोध को दबा देता है, उसपर भगवान प्रसन्न होते हैं। क्रोध पर नियंत्रण नहीं रखने वाले का विनाश हो जता है।


उपरोक्त बातें स्वामी श्री ने ज्ञान-यज्ञ में प्रवचन करते हुये कहीं। श्री स्वामी जी ने कहा कि जीवन में क्रोध से बचना चाहिये लेकिन सभी क्रोध एवं व्यवहार अधर्म नहीं होते। समाज और राष्ट्रहित में क्रोध करना धर्म है। चिकित्सक द्वारा घाव पर चाकू लगाना मानव हित में है। जबकि दूसरे लोग अगर किसी को चाकू मार दें तो अधर्म है।

स्वामी जी ने श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के तहत राजा प्रचेतादक्ष द्वारा पुत्रों को शिक्षा दिये जाने की चर्चा की। उन्होंने कहा कि शास्त्र का नियम है कि 50 वर्ष के बाद 51 से 59 वर्ष तक एक-एक करके अपने पुत्र को समय रहते जिम्मेवारी सौंप देनी चाहिये। यदि बेटा घर का कार्य करने के लायक हो गया तो पिता को मालिक का कार्य त्याग कर बेटा को दायित्व देना चाहिये। साठ साल के बाद पारिवारिक स्वामित्व नहीं छोड़ने पर पुत्रों की उलाहना सुननी पड़ती है। स्वामी जी ने कहा कि मंत्र का मतलब विद्या, ज्ञान और विज्ञान होता है। विद्या को मानव का आभूषण कहा गया है। विद्या पाकर अगर विनम्रता नहीं आयी तो वह सही विद्या नहीं; क्योंकि शास्त्रों की मान्यता है कि विद्या ददाति विनयम्।

उन्होंने निराकार और साकार ब्रह्म की चर्चा करते हुये कहा कि ब्रह्म शब्द तभी सही होगा, जब आकार हो। जब कोई आकार नही ंतो वह ब्रह्म नहीं कहलायेगा। जैसे बंाझ के पुत्र को मानना। यदि माॅ बांझ है, तो उसका पु कैसे? बंध्या और माता दोनों शब्द आपस में व्याघातक हैं। जो बंध्या है, वह माता नहीं। जो माता है, वह बंध्या नहीं है। उसी तरह जो ब्रह्मा है, उसका आकार है और जो आकारहीन है, वह ब्रह्म नहीं है। मानस में आया है कि निराकार ब्रह्म ही साकार ब्रह्म का रूप ले लेता है। जब भक्त की साधना चरम अवस्था पर पहंचती है तो वह निराकार तत्त्व साकार रूप ग्रहण कर अवतरित होता है। जैसे घड़ा में जल भरा है, तो यह साकार है। जब यह जल धूप से वाष्प में बदल जाता है तो यही निराकार है।