आरा : हिन्दुओ के धार्मिक आस्था का केंद्र प्रखंड के प्राचीन कुण्डवा शिवमंदिर (कुडवा शिवमंड)। पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक दृष्टिकोंण से काफी महत्वपूर्ण है। अपने अद्भुत शिल्पकला एवं बेहतरीन कारीगरी के कारण मंदिर को किंदवंतियो के अनुसार महाभारतकालीन होने का गौरव प्राप्त है। मंदिर की बनावट ही इसे पुरातन मंदिरों की श्रेणी में खड़ा करती है। प्राचीन शिवमंदिर होने के कारण शिवरात्रि पर्व पर या सोमवार को दर्शनार्थियों की भारी भीड़ होती है। प्रशासन द्वारा इसकी बंदोबस्ती भी की जाती है।बावजूद इसके दर्शनार्थियों के लिए मूलभूत सुविधाये भी नही है।

कुण्डवा शिवमंदिर भोजपुर जिला मुख्यालय से करीब 30 किमी पश्चिम आरा-बक्सर मुख्यमार्ग एनएच 84 से बिल्कुल सटे उतर दिशा में बिलौटी एवं शाहपुर के बीच अवस्थित है। यह प्राचीन शिवमंदिर कब बना इसका कोई लिखित प्रमाण तो नही मिलता,परंतु लोक गाथाओं,किंदवंतियो, बनावट, स्थापत्यकलाकृतियों से यह अनुमान लगाया जाता है कि यह मंदिर महाभारत कालीन राजाओ द्वारा बनवाया गया हो।ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण यह मंदिर समुचित व्यवस्था एवं प्रोत्साहन के आभाव में ऐतिहासिक धरोहर की ओर आजतक पुरातत्ववेत्ताओं का ध्यान आकर्षित नही कर पाया।

वर्तमान में मंदिर का अवशेष एक आयताकार झाड़ीनुमा ऊंचे टीले पर अवस्थित है। जिसका क्षेत्रफल लगभग 5 एकड़ में फैला हुआ है यह भूखंड टीले के बीचोबीच उतर दिशा की तरफ प्राचीन प्रधान शिवमंदिर अवस्थित है। सतह पर मंदिर लगभग 30 फिट लंबी 10 फिट चौड़ी है। करीब 30 फीट ऊंचे गुम्बज वाले इस मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम की तरफ खुलता है जो अमूमन आम शिवमंदिरो से इसे भिन्न करता है। मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंग गोलाकार लंबा न होकर चपटा है। किंदवंतियो के अनुसार यह शिवलिंग मंदिर के पास के तालाब(कुंड) से प्राप्त हुआ था।

बताया जाता है कि महाभारत कालीन असुरो का राजा वाणासुर यही आकर गंगानदी के मुख्यधारा के किनारे तपस्या करता था। तपस्या करने के उपरांत उसने यज्ञ करने की ठानी तथा यज्ञ के लिए हवन कुंड की खुदाई होने लगी। हवन कुंड के खुदाई के दौरान श्रमिकों का फावड़ा (कुदाल) किसी ठोस आधार से टकराया जिसके बाद इस कटे शिवलिंग जो कुदाल से कटने के बाद चपटे आकर के इस शिवलिंग को वाणासुर द्वारा मंदिर बनवाकर स्थापित किया गया।

इस प्राचीन शिवमंदिर के समीप दीवार के सहारे कई प्राचीन टूटी फूटी मुर्तिया टीकाकर रखी गई है। काले पत्थरों से बनी यह मुर्तिया कृषको द्वारा समय-समय पर कृषि कार्य हेतु खुदाई के दौरान प्राप्त हुई है। मूर्तियों की बनावट से इसकी प्राचीनतम होने का एहसास होता है। इस मंदिर का आश्चर्यजनक पहलू यह भी है कि इसे बनाने में ईट का प्रयोग नही हुआ है। यह मंदिर वृहद शिलाखंडों को काटकर बनाया गया है। यद्यपि की यहाँ करीब 100 किमी तक पहाड़ का नामोनिशान नही है तो इतने बड़े शिलाखंडों को यहां तक कैसे लाया गया होगा। मंदिर की शिलाखंडों पर उकेरी गई कलाकृतियों को तत्कालीन कारीगरों की काबलियत को दर्शाता है।

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