नहाय-खाय के साथ मंगलवार को श्रद्धा और आस्था का पर्व जिउतिया आरंभ हो चुका है. बुधवार को व्रती महिलाएं निर्जला उपवास रखेंगी. जिउतिया अर्थात जीवित्पुत्रिका व्रत का विशेष महत्व है, जीवित्पुत्रिका व्रत माताएं अपनी संतान की सुरक्षा, स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु होने के लिए करती रही हैं. आमतौर पर इस व्रत को लेकर धारणा है कि यह व्रत पुत्र प्राप्ति के लिए किया जाता जबकि विद्वान बताते हैं यह व्रत संतान को दीर्घायु होने की कामना के साथ किया जाता है। ज्योर्विद पंडित ब्रजेश मिश्र बताते हैं कि दरअसल पुत्र शब्द का प्रयोग संतान यानी पुत्र और पुत्री दोनों के लिए किया जाता है। इस कारण इस व्रत के नाम से कोई भ्रम नहीं रखना चाहिए। यह पर्व बेटा और बेटी दोनों के प्रति माता का समर्पण दर्शाता है। यह व्रत जिनको बेटा और बेटी दोनों है। इस व्रत का महत्व संतान की बेहतरी के लिए है।

हिंदू पंचांग के अनुसार यह व्रत आश्विन माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है. यह पर्व बिहार और झारखंड के अलावा उत्तरप्रदेश और पड़ोसी देश नेपाल में भी मनाया जाता है. जिउतिया पर्व को लेकर बाजार में सोमवार को गहमा-गहमी रही. खासकर महिलाओं की भीड़ अधिक देखी गयी.

आज लिया जायेगा व्रत का संकल्प : मंगलवार को व्रती महिलाएं सुबह स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेंगी. प्रदोष काल में गाय के गोबर से आंगन को लीपने के बाद वहीं एक छोटा सा तालाब बना कर उसमें एक पाकड़ की डाल को खड़ा किया जाता है. जीमूतवाहन की कुश निर्मित मूर्ति जल या मिट्टी के बर्तन में स्थापित कर पीली और लाल रुई से उसे सजा कर तथा धूप, दीप, चावल, फूल, माला एवं विविध प्रकार के नैवेद्यों से उसका पूजन करना चाहिए. अपने वंश की वृद्धि और प्रगति के लिए बांस के पत्तों से पूजा करना चाहिए. इसके बाद व्रत की कथा सुननी चाहिए.

क्या है जिउतिया व्रत की कथा : कहते हैं कि प्राचीनकाल में जीमूतवाहन नामक का एक राजा था. वह बहुत दयालु और न्यायप्रिय था. जब उनका मन राजपाट में नहीं लगने लगा तो राज्य का भार अपने भाइयों पर छोड़कर वह स्वयं वन में पिता की सेवा करने चला गया. एक दिन वन में जीमूतवाहन को एक वृद्धा के रोने की आवाज सुनायी दी. वे उस वृद्धा के समीप पहुंचे. उन्होंने वृद्धा से उसके रोने का कारण पूछा तो उसने बताया कि मैं नागवंश की स्त्री हूं तथा मेरा एक ही पुत्र है.

नागों द्वारा रोज एक नाग पक्षीराज गरुड़ को भोजन के लिए दिया जाता है. आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बलि का दिन है. उस वृद्धा की व्यथा सुनकर जीमूतवाहन ने कहा कि मैं आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा जरूर करूंगा. जीमूतवाहन वचन देकर स्वयं गरुड़ को बलि देने के लिए चुने गए स्थान पर लेट गए. गरुड़ नाग के स्थान पर जीमूतवाहन को देखकर आश्चर्य में पड़ गए और जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा.

जीमूतवाहन की बहादुरी और परोपकार की भावना से प्रभावित होकर गरुड़देव उन्हें तथा नागों को जीवनदान दिया. इसके बाद से ही जिउतिया व्रत का विधान शुरू  है।जिउतिया में फलों का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा रही है. इसको लेकर सोमवार को फलों का बाजार गर्म रहा. फलों में खासकर केला और खीरा की बिक्री सबसे अधिक हुई. अन्य फलों में सेब, मौसमी, अमरूद, नाशपाती जैसे फलों की भी बिक्री हुई. पर्व को लेकर फलों के दाम में अप्रत्याशित वृद्धि देखी गयी.

15 रुपये दर्जन मिलने वाला केला 30 रुपये दर्जन मिल रहा था. जबकि खीरा जो 25 रुपये किलो मिल रही थी, 40 रुपये किलो खूब बिका. नाशपाती 60 रुपये से बढ़ कर 80 रुपये किलो हो गया. वहीं सेब 80 रुपये से बढ़ कर 120 रुपये किलो तक पहुंच गया. इसके अलावा व्रती महिलाओं ने जिउतिया से जुड़े अन्य सामान और खाजा तथा नोनी साग की भी खरीदारी की.