न्यूज़ बिहार डेस्क (पटना)  बिहार की राजनीति किस करवट बैठेगी बड़े बड़े पंडितों की भविष्यवाणी भी फेल हो जा रही है। उसके साथ साथ रोज एक नया खुलासा और एक
दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाए जा रहे हैं। कल के विरोधी आज मित्र है और जो मित्र थे अमित्र हैं। इन सब के बीच सह मात के खेल में भाजपा अभी एक पायदान आगे चल रही है।
बिहार में भाजपा ने हारी हुए बाजी जीत कर खुद को शाहंशाह साबित कर दिया है। रणनीति के पीछे चाहे तर्क कुछ भी दिया जाए। भले ही कोई इस नए समीकरण और सियासी उलट फेर का खुद को सूत्रधार माने। परंतु सच यही है कि मोदी और शाह की जोड़ी आज के राजनीति का खरा सिक्का है। जहां भी इसे चलाया गया पूरे चमक दमक से बाजार पर अधिपत्य स्थापित किया है। दोनों के साथ पूरी भाजपा की टीम आंख खोल कर हर स्थिति परिस्थिति का आंकलन करते हुए उस पर सही समय पर सही फैसला ले रही है।
बिहार में बाढ़ की भयावह स्थिति पिछले एक माह से है। प्रधानमंत्री मोदी ने बाढ़ पीड़ितों की हर तरह से सहायता करने का आश्वासन दिया है। राहत बंट रहे हैं और एनडीए सरकार के सभी धड़े समाचार के माध्यमों पर पूरी तरह सक्रिय दिख रहे हैं। राहत के ट्रक और सामग्री के साथ फोटो, वीडियो और बयान लगातार आ रहे हैं। इस बीच राजद जिसे सबसे बड़ा झटका महागठबंधन टूटने से लगा, वो जनादेश अपमान यात्रा कर रही है। शरद यादव नीतीश कुमार से अलग तेवर में तीर खींचने पर आमादा हैं। उधर नीतीश खेमा भी इस बार शरद को निपटाने का मन बना चुका है।
इस बीच खबर आई नरेंद्र मोदी बाढ़ सर्वेक्षण के दौरा पर बिहार आ रहे हैं। आनन फानन में 26 अगस्त को उनका बिहार आगमन तय हुआ। उधर 27 अगस्त को राजद की रैली है। हालांकि दोनों ही कार्यक्रम को देखा जाए तो बिल्कुल ही अलग और स्वभाविक है। परंतु कहीं न कहीं भीतरखाने में लालू की रैली से पूर्व नरेंद्र मोदी का बिहार दौरा संवेदना से इतर सियासी लग रहा है। यह दौरा एक दिन बाद या कुछ दिन पहले भी हो सकता था। पर ऐन रैली से एक दिन पूर्व मोदी का दौरा, सियासी ब्यूह रचना की तरफ इशारा करता है।
जिस परिस्थिति में चार साल बाद नीतीश और भाजपा का पुनः मिलाप हुआ है। उसे तोड़ना लालू प्रसाद और विपक्षी कुनबे के लिए हाल में तो बड़ा ही मुश्किल दिखाई दे रहा है। वहीं एनडीए पूरी मुस्तैदी से सत्ता की सियासत में रोज एक पग आगे बढ़ रहा है। उस के बाद भाजपा से ज्यादा तल्ख तेवर में जदयू का लालू पर हमला कुछ अलग ही कहानी रच रहा है। इस सियासी कुश्ती में बिहार की सत्ता में आने से पूर्व भाजपा हमलावर थी। पर अब वह बिल्कुल शांत और संयमित है वहीं जदयू तीर का लगातार प्रहार कर रहा है।
नई परिस्थिति में बिहार की हालिया राजनीति में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से इंकार नही किया जा सकता है। जैसे हालात दिखाई दे रहे हैं उसमें विपक्ष कमजोर हुआ है। नीतीश कुमार के एक फैसले ने भाजपा को बिहार की सत्ता में वापसी करा दी। साथ ही भाजपा को प्रदेश में जनाधार बढ़ाने का एक सुनहरा मौका भी दे दिया। भाजपा जिस रणनीति पर पिछले चार पांच सालों से काम कर रही है उसके लिए यह बड़ा ही सुनहरा अवसर है। नीतीश कुमार व लालू प्रसाद को बिहार की सियासत में अपराजेय और जन नेता माना जाता था। पर भाजपा ने इस वर्जना को अपनी सियासी सूझबूझ और रणनीति से ध्वस्त कर दिया है और इसे नेस्तनाबूत करने की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा दिया है। हो न हो उसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है नरेंद्र मोदी का लालू प्रसाद की रैली से पूर्व बिहार दौरा।
सबसे अहम प्रश्न जो हर किसी के जेहन में है वो ये है कि नीतीश कुमार जैसे पोलिटिकल इंजीनियरिंग के माहिर माने जाने वाले ने खुले तौर पर नरेंद्र मोदी की श्रेष्ठता स्वीकार कर ली है। जो खुद कुछ दिनों पूर्व तक नरेंद्र मोदी के सबसे प्रबल प्रतिद्वंदी के रूप में अपने आप को प्रोजेक्ट कर रहे थे। अचानक मैदान से हटने और उसी कुनबे का हिस्सा बनना मोदी मैजिक का ही कमाल है। देखना होगा कि लालू की रैली से पूर्व नरेंद्र मोदी का बिहार दौरा क्या लेकर आता है।
कहते हैं, चिराग रौशन है तुम भी उजाले में आ जाओ।

कारवां निकल पड़ा है मंजिल को, अंधेरे से निकल जाओ।।

स्तंभकार: विजय मिश्र बाबा