आजकल की दुनिया डिजिटल हो गई है और तकनीक ने धर्म-आस्था के क्षेत्र में भी अपनी पैठ बनाई है, पर कुछ ऐसे विधान भी हैं, जहां परंपरा आज भी चट्टान की तरह कायम है। अब तो ऑनलाइन पूजा-पाठ भी होने लगे हैं, पर पितृपक्ष में अपने पूर्वजों को तर्पण अर्पण करने के लिए कोई भी तकनीक है। यह वह आस्था है, जहां पुत्र को स्वयं आकर अपने हाथों से ही गयाजी में पिंडदान करना होगा।

गयाजी में पौराणिक काल से तर्पण और पिंडदान की परंपरा रही है। शास्त्र बताते हैं कि यहां कभी 364 पिंडवेदियां होती थीं। यहां प्रत्येक पिंड पर प्रतिदिन पिंड का विधान था। लोग आते थे और साल-साल भर रहते थे। समय के साथ लोगों की व्यस्तता बढ़ी, जीवनशैली भी बदली तो इसका असर इस पर पड़ा। अब 54 वेदियां रह गई हैं, जहां पिंडदान होता है। लोग अब पंद्रह दिनों तक भी रुकते हैं और एक दिन में भी कर्मकांड संपन्न कर लौट जाते हैं, पर आते जरूर हैं। कहा तो यही जाता है कि यहां फल्गु का जल स्पर्श कर लेने भर से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

तकनीक ने लोगों की परेशानी थोड़ी कम कर दी। अब लोग ऑनलाइन पितृपक्ष से संबंधित हर जानकारी ले लेते हैं। कब आना है, कहां ठहरना है, यह सब तय हो जाता है। हां, आना तो पड़ेगा। प्रशासन ने भी यात्रियों की सुविधा के लिए वेबसाइट और एप बनाया है। इससे वे गया, पिंडदान, तर्पण, दान-दक्षिणा, आवासीय व्यवस्था आदि की जानकारी लेकर अपनी यात्रा शुरू करते हैं।
गया के पीतल किवाड़ वाले पंडा महेश लाल गुप्त बताते हैं कि समय के साथ बहुत बदलाव हुए हैं। पहले पितृपक्ष के समय इतनी व्यवस्था नहीं होती थी, अब सरकार और प्रशासन इसमें जुटा रहता है। लोग नई तकनीक से भी जुड़े हैं, घर बैठे हर जानकारी मिल जाती है। पर, सबसे बड़ी बात यह कि परंपरा और आस्था नहीं बदली है। पिंडदान के लिए तो यहां आना ही पड़ता है। ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती कि आप कहीं से भी तर्पण कर दें। गया की भूमि पर विष्णु चरण का दर्शन और फल्गु में तर्पण का कर्म ही पितरों को मोक्ष दिलाता है।

इस परंपरा का निर्वहन नई पीढ़ी भी कर रही है। पहले बुजुर्ग ही पिंडदान के लिए आते थे। पढ़े-लिखे लोगों में भी पितरों के प्रति अपनी श्रद्धा देखने को मिलती है। पुणे में काम कर रहे एक इंजीनियर राजू ने फोन कर यह जानना चाहा कि क्या वह माता-पिता का श्राद्ध कर सकता है? उसे बताया गया कि यहां आकर कर सकता है। इससे यह पता चलता है कि पितरों के लिए मोक्ष का भाव किस कदर विद्यमान है।
इस सनातन परंपरा का निर्वहन भारत के लोग तो करते ही हैं, विदेशियों में भी इसके प्रति आकर्षण है। पिछले कुछ वर्षों में पितृपक्ष के दौरान कई विदेशियों ने तर्पण और पिंडदान का कर्मकांड यहां संपन्न किया है। अमूमन पिंडदान के बाद पूजन सामग्री को नदी में प्रवाहित करने का विधान है, पर अब इसमें बदलाव आया है। कुछेक को छोड़ दें तो लोग पिंड को किनारे पर ही रहने देते हैं, जिसे स्थानीय लोग उठा लेते हैं। प्रशासन ने भी नदी की स्वच्छता पर ध्यान दिया है और यह व्यवस्था की है कि पिंडदान के बाद अवशिष्ट पदार्थ वहां से उठा लिए जाएं।

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