मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काफिले पर हुए हमले के बाद बिहार की राजनीति पूरे उफान पर है। मुख्यमंत्री के द्वारा एक तरफ जहां जांच दल का गठन कर इस घटना की सत्यता जानने के लिए एक सप्ताह का वक्त दिया है। वही इस घटना को लेकर राजद और जदयू में बयानों के माध्यम से तल्खी जारी है।

मुख्यमंत्री पर हमले की घटना को हर तरफ दुखद और निंदनीय बताया गया राजनीतिक दलों से लेकर हर तबके के लोगों ने मुख्यमंत्री पर हमले की घटना पर अफसोस जाहिर किया है। वही जदयू ने मुख्यमंत्री पर हमले की घटना के पीछे राजद का हाथ होने का बात कहा है। हालांकि इसके कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आए हैं। उसके बावजूद भी दोनों दलों के नेता आपस में जमकर बयान बाजी कर रहे हैं। इस बीच मुख्यमंत्री के काफिले पर हुए हमले के लिए गठित जांच दल नंदन गांव, जहां की घटना घटित हुई थी प्रमंडलीय कमिश्नर आनंद किशोर के नेतृत्व में पहुंच चुकी है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मुख्यमंत्री नीतीश के काफिले पर हमले के आरोप में डेढ़ दर्जन से ज्यादा स्थानीय लोगों को हिरासत में लिया गया है।  घटना स्थल के समय वहां डुमराव के विधायक ददन पहलवान भी मौजूद थे, जिनसे पूछताछ की गई। सूत्र बताते हैं की मुख्यमंत्री के काफिले पर हमले से जुड़े वीडियो फुटेज के आधार पर दोषियों का पहचान कर उन्हें गिरफ्तार किया गया है। हालांकि इस को लेकर स्थानीय लोगों ने भय और गुस्से का मिश्रित माहौल बन गया है।

नंदन गांव में मुख्यमंत्री नीतीश पर हुए हमले की जाँच में गए प्रमंडलीय आयुक्त के नेतृत्व वाली टीम के जांच के लिए पहुचने के बाद राजद नेता और बिहार के पूर्व स्वास्थ मंत्री तेजप्रताप यादव ने कहा है कि “प्रमंडलीय आयुक्त ने माना है कि “एक समुदाय” के लोगों के यहाँ विकास नहीं हुआ, इसी कारण लोग आक्रोशित थे। यही है मुख्यमंत्री नीतीश का न्याय के साथ विकास का मॉडल…”

Posted by Amardeep Jha Gautam on Saturday, 13 January 2018

मुख्यमंत्री के काफिले पर हुए हमले को लेकर जिस तरह की राजनीति हो रही है। उसमे तेज प्रताप यादव का बयान काफी अहम है। उन्होंने यह बताने का प्रयास किया है कि मुख्यमंत्री पर हमले में झूठमूठ का राजद को घसीटा जा रहा है। जबकि मुख्यमंत्री और उनके काफिले पर हमला से राजद का कोई लेना देना नही है। मुख्यमंत्री को आत्मावलोकन करना चाहिए न कि अपनी नाकामियों और अपने कर्मों को छिपाने के लिए हर दोष राजद पर मढ़ दें। जनता सब देख रही है और अंततः लोकतंत्र में अंतिम फैसला जनता को ही करना है।

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