न्यूज़ बिहार डेस्क: हमारे देश में अनेकता में एकता देखने को मिलती है। यानि कि यहां कई सारे धर्म और संप्रदाय से जुड़े लोग रहते हैं और ऐसे में जाहिर सी बात है कि यहां कई प्रकार के मंदिर,मस्जिद,चर्च, गुरूद्वारे देखने को मिलती है। प्रत्येक स्थान के अपने कुछ नियम कानून है और इनका पालन यहां आने वाले लोग निष्ठापूर्वक करते हैं। आज हम आपको एक ऐसे धार्मिक स्थल के बारे में बताने जा रहे हैं जहां के नियम बाकी अन्य जगहों से काफी अलग है।
ये एक ऐसा मंदिर है जिसका दर्शन कोई भी इंसान जागृत आंखों से नहीं कर सकता। केवल भक्तों के लिए ही नहीं बल्कि मंदिर के पुजारी भी पूजा के दौरान अपनी आंखो पर पट्टी बांध लेते हैं। ये मंदिर उत्तराखंड के चमोली जिले में देवाल नामक ब्लॉक में स्थित है, जहां भक्तों का जाना मना है।

दरअसल, आपने माता पार्वती और भोलेनाथ के बारे में तो बहुत सारे कहानियां सुनी होंगी देवी पार्वती के माता पिता के बारे में भी आप सब ने सुना होगा लेकिन उनके भाई के बारे में शायद आप सब ने नहीं सुना हो जी हां उनका एक भाई भी था जो आज भी हिमालय की तलहटी के पहाड़ो में स्थित एक कैदखाने में बन्द हैं. इनको स्वयं पार्वती जी ने कैद का दण्ड दिया था. आज हम आपको इस दंड के पीछे का राज बताने जा रहे है. आखिर कहा बंद है शिवजी के साले? ऐसा कहा जाता है कि शिवजी के साले युगों से एक कैदखाने में बंद है. यह कैदखाना उत्तराखंड में मौजूद है. यह कैदखाना एक मंदिर है, जो साल में केवल एक बार कुछ घंटों के लिए खुलता है. यह मंदिर केवल वैशाख पूर्णिमा के दिन ही खुलता है. यहां विराजमान देवता एक मात्र ऐसे देवता है जिनके दर्शन पुजारी भी नहीं कर पाते हैं. क्योंकि मंदिर का द्वार खोलते समय पुजारी के आंखों पर पट्टी बंधी होती है. माना जाता है कि कैदखाने में देवता एक विशाल सांप के रुप में विरामान रहते हैं जब भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था तब उन्हें विदा करने के लिए उनके सारे भाई कैलाश की ओर चले गये थे. इन भाइयों में से एक भाई लाटू को रास्ते में बहुत तेज प्यास लगी थी.

वो पानी के लिए इधर-उधर भटकने लगें. भटकते हुए अचानक वो किसी के घर में पहुंचे. घर में एक बुजुर्ग था जिसने लाटू से कहा कि कोने में मटका है पानी पी लो. संयोग से वहां दो लोटे मौजूद थे. लाटू ने एक मटका पूरा खाली कर दिया. लाटू की प्यास इतनी गहरी थी कि उन्हें पता ही नहीं चला कि वो मदिरा पी रहे है. जब कुछ देर बार मदिरा ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो लाटू अपना आपा खो बैठे. ये देखकर देवी पार्वती क्रोधित हो गयी और लाटू को कैद में डाल दिया. तब पार्वती ने दंड दिया कि इन्हें हमेशा कैद में ही रखा जाएगा.

यहां के लोग इसे लाटू मंदिर के नाम से जानते है। इस मंदिर में लाटू देवता का पूजा किया जाता है। इस मंदिर में स्त्री और पुरुष दोनों का ही जाना मना है। इस मंदिर के पुजारी अपनी आंख, नाक और मुंह पर पट्टी बांध कर ही पूजा करते हैं।
यहां आने वाले भक्तोंं को मंदिर से 75 फीट की दूरी पर खड़े होकर पूजा करना पड़ता है। यहां के लोगों की मान्यता है कि लाटू देवता उत्तराखंड की आराध्या नंदा देवी के भाई हैं। हर बारह साल में उत्तराखंड की सबसे लंबी श्रीनंदा देवी की राज जात यात्रा का बारहवां पड़ाव वांण गांव है।

लाटू देवता वांण गांव से हेमकुड तक नंदा देवी का अभिनंदन करते हैं। इस मंदिर का द्वार साल में एक ही दिन खुलता हैं और वो दिन है वैशाख मास की पूर्णिमा जिस दिन पुजारी इस मंदिर के कपाट को अपने आंख-मुंह पर पट्टी बांधकर खोलते हैं। मंदिर का कपाट जब खुलता है, उस वक्त विष्णु सहस्रनाम और भगवती चंडिका का पाठ किया जाता है। इस दिन यहां एक मेला भी लगता है।

यहां के लोगों में इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि मंदिर के अंदर नागों के देवता नागराज अपनी अद्भुत मणि के साथ विराजित है। हांलाकि ऐसा करने के पीछे लोगों का मानना है कि नागराज की मणि का तेज बहुत अधिक होता है जिसके तेज से आंखों की रोशनी तक जा सकती है और नाक में विषैली गंध न जा सकें इस वजह से नाक में लोग पट्टी बांधते हैं।

Subscribe us on whatsapp