न्यूज़ बिहार डेस्क, प्रारब्ध : आधुनिक युग है इसमें कई बातें ऐसा हैओ जिसे अज्ञानता वस या कहें तो शास्त्र, वेद, पुराण, उपनिषदों को पढ़ने सुनने के अभाव में बातों और व्यवहार को समझने में परेशानी हो रही है। उसके साथ ही श्राद्ध जैसे कर्म, उसके किये जाने, दान व प्रदान की जाने वाली चीजें पितरों को प्राप्त कैसे होती है इस बात की जिज्ञासा स्वभाविक है। लोगों सोचते है पितृपक्ष में किये गए जलार्पण, श्राद्ध मे अन्न व अन्य सामग्री पितरो को कैसे प्राप्त होती हैं?

यह प्रश्न उठना भी अपने आप मे लाज़मी है क्योंकि कहा जाता है कि विभिन्न कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद जीव को भिन्न भिन्न गतियां प्राप्त होती हैं। कोइ देवता बन जाता है, कोइ पितरौ, कोई प्रेत, कोइ हाथी, कोइ चींटी, कोइ वृक्ष गुल्म तृणादि भी हो जाते हैं। तब पिण्ड जल से तृप्ति कैसे मिलती हैं। हमारे शास्त्रों मे आया है नाम गोत्र के सहारे वे सभी दी गई वस्तु लोक के अनुसार प्राप्त होती हैं। पितृ लोक मे कव्य के रुप मे प्राप्त होता है, हव्य और अमृत के रूप मे देव लोकवासियों को प्राप्त होता है। दी जाने वाली वस्तुऐं पशु योनि मे तणृरुप, नागादि योनि में वायुरुप, यक्ष योनि मे पान रुप से श्राद्धीय वस्तु भोग्य रुप मे प्राप्त होता है। किस रूप में भोज्य प्राप्त होता है मार्कण्डेय पुराण का वचन प्रमाण है।

नीममन्त्रास्तथा देशा भावान्तरगतानपि।
प्राणिनः प्रीणयन्त्येते तदाहारत्वमागतान्।।

देवो यदि पिता जाता शुभ कर्मानुयोगतः।
तस्यान्नममृतं भूत्वा देवत्ये$प्यनुगच्छति।।

मर्त्यत्वे ह्यन्न रुपेण पशुत्वे च तृणं भवेत्।

श्राद्धान्नं वायुरुपेण नागत्वे$प्युपतिष्ठति।।

पानं भवति यक्षत्वे नाना भोगकरं यथा।।

यह प्रमाण वायु पुराण के साथ श्राद्ध कल्पलता भी अनुमोदन करता है। जिस प्रकार गेशाला में गायों से भरी हो फिर भी बछड़ा अपनी माता का पहचान कर लेता है ठीक उसी प्रकार सम्यक् नाम गोत्र के माध्यम से दी गयी वस्तु वहा उनको उस रुप मे प्राप्त हो जाती हैं। नाम, गोत्र, हृदय की श्रद्धा, एवं उचित संकल्प पूर्वक दिए हुए पदार्थ भक्ति पूर्वक उच्चारित मन्त्र उनके पास पहुँचा देता है। जीव चाहे सैकड़ों योनियों को पार क्यों न कर गया हो फिर भी तृप्ति वहाँ पहुँच जाती हैं। वायु पुराण में लिखा गया है …

यथा गोष्ठे प्रणष्ठां वै वत्सो विंदेत् मातरम्।
तथा तं नयते मन्त्रो यन्तुर्यत्रावतिष्ठते।।

#क्रमशः…………………

पुरोहित चेरिटेबल ट्रस्ट
पुरोहित अजीत तिवारी “वैदिक”
पुरोहित वेद व्यास पाठशाला