न्यूज़ बिहार डेस्क, प्रारब्ध : आरा केे चन्दवा में चल रहे विश्व कल्याणार्थ चातुर्मास यज्ञ में प्रवचन करते हुए जियर स्वामी ने कहा, ज्ञान के बिना शिक्षा फलवती नहीं होती। साकारात्मक सोच वाले ही लक्ष्यभेदी होते हैं। कुछ लोग तो विरोध करना ही अपना लक्ष्य या ध्येय मान लेते हैं।

स्वामी जी कहते हैं, मर्यादित जीवन नहीं हो तो शिक्षा और आशीर्वाद भी श्राप बन जाते हैं। औरत की मर्यादा पतिव्रता होने, मानव जीवन की सार्थकता वैष्णव धर्म अपनाने और विज्ञान का महत्ता ज्ञान के प्रसार में करने से है। अच्छे कार्य का विरोध वही करता है, जो स्वयं कुछ नहीं करता सिर्फ बोलता है। ऐसे लोग सकरात्मक कार्य करने या सहयोग प्रदान करने की बजाय सिर्फ दूसरे की खूबियां नही खामियां निकालते हैं।

स्वामी जी ने कहा कि शास्त्रों में वर्णित है कि कभी-कभी श्राप भी आशीर्वाद बन जाता है। नारद जी ने राजा प्रचेतादत्त के ग्यारह हजार पुत्रों को सन्यासी बना दिये, जिससे कुपित होकर प्रचेतात्त ने नारद जी को श्राप दे दिया कि आप एक जगह स्थिर नहीं रहेगे। यह श्राप नारद जी के लिये वरदान सावित हुआ; क्योंकि भ्रमणशील सन्यासी कभी दूषित नहीं होते। इसी तरह इंद्रलोक में अर्जुन को अप्सरा ने श्राप दे दिया कि वे एक साल नपुंसक रहेंगे। यह श्राप अर्जुन के अज्ञातवाश में वरदान सावित हुआ।

स्वामी जी ने कहा कि अच्छे कार्य का प्रतिकार नहीं होनी चाहिये। बल्कि उसमें सहयोग की भावना होनी चाहिए। अच्छे कार्य करने वाले सिर्फ अपने लक्ष्य को देखते हैं। वे इस बात पर ध्यान नहीं देते कि दूसरे लोग उनके विरुद्ध क्या टिप्पणियां कर रहे हैं। इसके विपरीत समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो स्वयं तो समाज एवं राष्ट्र हित में कुछ नहीं करते लेकिन दूसरे के कार्यो में खामियां निकालते रहते है। व्यक्ति को दूसरे के कार्य में कमियां ढूंढने की बजाये स्वयं समाज हित में कार्य कर आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये।

स्वामी जी ने यज्ञ की महत्ता बताते हुये कहा कि इससे प्राकृतिक संतुलन को बल मिलता है। मानव जीवन के तीन ऋण मातृ-पितृ त्रण, ऋाि ऋण ओर देव ऋण हैं। इन तीन ऋणों से उद्धार होना चाहिये। यज्ञ से देव ऋण से मुक्ति का अवसर प्राप्त होता है। यज्ञ सिर्फ कर्मकांड नहीं बल्कि जरूरत मंदों को रोजगार, भूखे को भोजन और जिज्ञासु को ज्ञान और सत्संग का अवसर प्रदान करता है। यज्ञ के माध्यम से आम लोगों को एक स्थान पर कई संत-महात्माओं को दर्शन सुलभ हो जाते हैं, जो सुअवसर विभिन्न तीर्थों और पवित्र स्थलों पर जाने के बाद भी दुर्लभ होता है। यज्ञ से अर्थव्यवस्था का चक्रीय क्रम भी पूरा होता है। यज्ञ में उपयोग आने वाली सामग्रियों के उत्पादन एवं विक्री से बाजार सशक्तिकरण भी होता है। यज्ञ के उपयोग में आने वाली अधिकंश सामग्रिया दुर्लभ होती हैं। सामन्य प्रयोग में नहीं आती। यज्ञ के निमित्त लोग उन पारम्परिक सामग्रियों का उत्पादन एवं संरक्षण करते है। यज्ञ के प्रति लक्ष्मी जी की विशेष कृपा होती है, क्योंकि इसमें नारायण की पूजा होती है। यज्ञ के लिए जितना जल्द संसाधन उपलब्ध होती है, उतना अन्य कार्य के लिए नहीं।