बाल विवाह और दहेज प्रथा को लेकर आज के इस मानव श्रृंखला को मैं पब्लिसिटी स्टंट बिल्कुल भी नहीं मानता। नीतीश जी के दिमाग के अंदर तो ख़ैर हम नहीं घुसे हुए हैं। लेकिन शहरी और ग्रामीण दोनों परिवेश को जीते रहने के बाद मुझे लगता है कि गाँव के लोग शहरी लोगों से ज़्यादा प्रगतिशील हैं। शिक्षित कम हैं लेकिन काम के हैं। आज की यह मानव श्रृंखला में बिहार के गाँव ही केंद्र में हैं। दहेज प्रथा पर नकेल कसना तो लगभग नामुमकिन है लेकिन बाल विवाह पर यह ज़रूर सफ़ल हो सकती है। शहर में लोग सरकार भरोसे कम हैं। स्कूल से लेकर अस्पताल वहाँ सब निजी हैं।

लेकिन गाँवों में ऐसा नहीं है। हर चीज़ के लिये लोग सरकार और सरकारी संस्थाओं पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। चाहे उनकी खेती हो या कोई आजीविका। इसलिये सरकार के प्रति उनका श्रद्धाभाव थोड़ा ज़्यादा होता है। इसलिये कि सरकार की वजह से उनका जीवनस्तर बेहतर हुआ है। कितना हुआ है, कितना होना चाहिये था यह सवाल भी शहरी बुद्धिजीवियों के लिये ही छोड़ रखा है उन्होंने।

हम स्वच्छ भारत अभियान करते करते आज अपने मोहल्ले तक को साफ़ नहीं कर पाये। शहर तो दूर एक घाट तक नहीं। लेकिन अब बिहार के गांवों में जाइये तो पता चलेगा कि कितने ब्लॉक और पंचायत ओडीएफ हो गये हैं। शुरू में सरकार ने खुले में शौचालय को लेकर दबाव बनाया लेकिन आज जब ऐसा कुछ नहीं है तो भी लोग पुराने ढर्रे पर नहीं लौटे। उन्होंने स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया उस चीज़ को जो सरकार उनसे चाहती थी।

इसी तरह यह मानव श्रृंखला भी अपने उद्देश्य में सफ़ल हो सकती है। क्योंकि फ़िर इस बार केंद्र में महिलायें हैं। हर बार जब सरकार की योजनाओं के बारे में वो सुनती हैं और इसका लाभ उन्हें मिलता है तो सरकार के प्रति उनमें एक अलग ही विश्वास होता है। इसी तरह जब सरकार उनसे कुछ अपील करती है तो उसे भी वो उतना ही महत्व देती हैं। उनके दिमाग में यह बातें रहती हैं कि सरकार का यह फ़ैसला भी कहीं न कहीं उनके हित में है। ग्रामीण क्षेत्रों की महिलायें उतनी शिक्षित नहीं होती लेकिन अपना विवेक उनके पास ज़रूर होता है। अपने अधिकारों और कर्तव्यों को लेकर वो बहुत ही सजग रहती हैं।
शराबबंदी की यह हकीकत है कि वह सफ़ल नहीं हुआ है। लेकिन इस बदलाव को लाने और सरकार को इसपर रोक लगाने का हिम्मत भी महिलाओं से ही मिला है। आज यह दहेज प्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियाँ भी आज ही पूर्ण नहीं लेकिन अगर समय के साथ बंद होती है तो सरकार के प्रति उनकी श्रद्धा और बढ़ जायेगी। फ़िर महिलाओं के वोट भी उन्हें मिलेंगे। लेकिन अगर सरकार के दिमाग में कुरीतियों को खत्म करने के एवज में महिलाओं का वोट लेना लक्ष्य है तो फ़िर भी मैं मानता हूँ सरकार अच्छी है।

हाईकोर्ट के ऑर्डर के बाद भी लोग अगर इतनी बड़ी संख्या में जुड़ रहे हैं तो इसके महत्व को झूठला नहीं सकते। लेकिन हम सब ठहरे बुद्धिजीवी। जमीन को कम समझते हैं। राजनैतिक बकैती ज़्यादा करते हैं। करते रहिये। लेकिन हाँ, स्वीकार करिये कि बिहार में बहुत कुछ अच्छा हो रहा है।

लेख- हृषिकेश शर्मा
( लेखक पत्रकारिता के छात्र एवं फ्रीलांस जर्नलिस्ट हैं )

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