न्यूज़ बिहार डेस्क, प्रारब्ध :  आज आपको पितृृृपक्ष और श्राद्ध में निषिद्ध सात बातों से अवगत कराते हैं। शास्त्रों के अनुसार हमारे ऋषि मुनि और ज्ञानियों ने लिखा है ….

दन्तधावनताम्बूलम् तैलाभ्यमभोजनम्।
रत्नौषधं परान्नं चश्राद्धकृत् सप्त वर्जयेत्।।

अर्थात : दन्तधावन (दतुअन ब्रस मंजनादि),ताम्बूलम् (ताम्बूल भक्षण, तमालपत्रखादन,सिगरेटादि), तैलमर्दन (तेल लगाना तिल सरसो आदि), उपवास न रहे परन्तु अन्न न ले,, स्त्रीसंग, औषधियों का सेवन, परान्न (दूसरो का अन्न) ये सात बाते श्राद्धकर्ता को नही करनी चाहिए।

उसके साथ ही यह वचन महाभारत शान्तिपर्व तथा श्राद्धकल्पलता का है। जिसके अनुसार आठ वस्तुओं के निषेध की चर्चा की गई है।
एक बार ही भोजन करें, यात्रा करना (श्राद्ध छोड़कर), भार वहन करना (न ढोवें), परिश्रम करना ,मैथुन, दान लेना, और हवन करना, श्राद्धान्न भोजन करना (किसी दूसरे श्राद्ध का भोजन) आदि श्राद्ध में निषेध किया गया है।

इसका प्रमाण कोई भी विष्णुरहस्य, यमस्मृति और श्राद्धकल्पलता में देख और पढ़ सकते हैं।

पुनर्भोजनमध्वानं भारमायास मैथुनं।

दानं प्रतिग्रहो होमः श्राद्धभुक्त्वष्ट वर्जयेत्।।

अर्थात कोई भी क्रिया या कर्म शास्त्र द्वारा दिये गए विधान के अनुसार करने पर उसका फल प्राप्त होता है। धर्म शास्त्र पुरोहित और ज्ञानियों द्वारा दिए गए दिशा निर्देश, दिखाए गए मार्ग और समझाए गए विधियों का पालन कर जिस क्रिया या कर्म को किया जा रहा है उसे पूरी तरह सार्थक किया जा सकता है। श्राद्ध श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म है जिस के द्वारा पितरों की तृप्ति का विधान है। जब आप इस नैमित्य अपने कर्तव्यों का साम्यक निर्वहन करने जा रहे हैं तो उसे विधि विधान के अनुसार ही करें। इससे किया गया कर्म फलित और सार्थक हो जाता है।

पुरोहित चेरिटेबल ट्रस्ट
पुरोहित अजित कुमार तिवारी “वैदिक”

#क्रमशः …..