न्यूज़ बिहार डेस्क, प्रारब्ध पितृपक्ष में जलार्पण और श्राद्ध का महत्व हमारे धर्म शास्त्रों में लिखा गया है। गुणीजन इसकी व्याख्या बहुत ही सरल तरीके से किये हैं तथा जीवन के सुकर्मों में इसे सर्वोच्च कर्म और एक कर्तव्य के रूप में दर्शाया गया है। अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और उनके तृप्ति के लिए तर्पण और श्राद्ध के महत्व को बताया गया है।

ॐ नमो नारायणाय ॐ गयागदाधराय नमः।

पृथ्वियां च गया पुण्या गयायां च गायशिरः।।

श्रेष्ठम तथा फल्गुतीर्थ तनमुखम च सुरस्य हिं।।

श्राद्धरम्भे गयायं ध्यात्वा ध्यात्वा देव गदाधर ।

स्व पितृन् मनसा ध्यात्वा ततः श्राद्ध समाचरेत ।।

पुरोहित कहते हैं श्री गया तीर्थ कि महिमा  तो अनन्त हैं, जिसका उल्लेख हमें समस्त पुराणों में मिलता है । गया तीर्थ श्राद्ध श्रेष्ठ पावन भूमि है  यहाँ भगवान विष्णु नारायण गदाधर विष्णु पाद के रूप में स्थित है ।जो अपनी शक्ति से सभी प्रकार के पापो का नाश कर मनोनुकूल फल प्रदान करते है  ,तथा  उनके सभी असंतृप्प्त पितरों को तृप्ति मुक्ति प्रदान करते है ।

शास्त्रो में मुक्ति प्राप्ति के मार्ग प्रशस्त किए है ।जिसमे सबसे सुलभ एवम उपयुक्त्त गया श्राद्ध है 

ब्राह्मज्ञानम  गयाश्राद्धम गोगृहे मरणं तथा ।

वासः पुसाम कुरुक्षेत्रे मुक्तिरेषां  चतुर्विधा ।।

ब्रह्मज्ञानेंन  किंम कार्य:  गोगृहे मरणेन किंम।

वासेन किं कुरुक्षेत्रे यदि  पुत्रो गयाम व्रजेत।। 

अर्थात, पुत्रो को गया तीर्थ पुत्र होने कि संज्ञा और अधिकार देता है । गया श्राद्ध करना पुत्र का कर्तव्य है।ऐसा न करने पर उनके पितर और शास्त्र दोनों ही पुत्र होने की संज्ञा नहीं देते । शास्त्रो के श्लोकानुसार पुत्र का कर्तव्य निर्धारित है। इस गरुड़ पुराण/स्कंद पुराण के श्लोक में कहा गया है….

जीवते वाक्यकरणात क्षयायः भूरी भोजनात।

गयायां   पिंडदानेषु   त्रिभि   पुत्रस्य   पुत्रता ।

अर्थात् …जीवित अवस्था में माता पिता के (वाक्य ) आज्ञा का पालन करना प्रथम कर्तव्य है।

मरणोपरांत भूरी भोजन कराना द्वितीय कर्तव्य है।

तथा गया श्राद्ध करना तृतीय कर्तव्य है।

श्लोकानुसार इन तीनो कर्तव्यों का निर्वहन करने पर ही पुत्र को पुत्रता प्राप्त होती है,अन्यथा वे पुत्र कहलाने योग्य नहीं ।
पुन्नाम नरकाय त्रायते इति पुत्र : (गरुड़ पुराण ) 
पुत्र वही है जो अपने पितरों को पुन्नाम नामक नरक से मुक्ति दिलाता हो ।

अतः मानव का परम कर्तव्य है कि पितृगणों के उद्धार एवं प्रसन्नता के निमित्त गया जी मे श्राद्ध अवश्य करे और अपने पुत्रत्व को सार्थक बनाये ।  

शास्त्रों में वर्णित गया -श्राद्ध का लाभ भौतिक जीवन के आशातीत आकांक्षाओ से भी अधिक लाभकारी है।

उदाहरणतः वह कार्य जो एक मानव का  भूप नरेश होने पर भी  कर पाना उसके लिये संभव नहीं है ।कुछ ऐसा ही फलदायीं है गया श्राद्ध। वायु पुराण में लिखा गया है ….

ततो गया समासाद्य  बर्ह्मचारी समाहितः। अश्वमेधवाप्नोति  कुलः  चैव  समुद्धरेत।।

अर्थात् , जो व्यक्ति गया जाकर एकाग्रचित हो विधिवत ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करता है वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करता है एवं समस्त कुलों का उद्धार करता है। मार्कण्डेय पुराण में कहा भी गया है …

आयु : प्रजा : धनं विधां स्वर्ग मोक्ष सुखानि च । प्रयच्छन्ति तथा राज्यं पितर: श्राद्ध तर्पिता ।।

श्राद्धकर्ता को उनके पितर दीर्घायु ,संतति ,धनधान्य , विद्या राज्य सुख पुष्टि ,यश कृति ,बल, पशु ,श्री ,स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करते है।

 सत्य सनातन के महानुभावो तथा  वेद- पुराणों ने मातृ:देवो भवः पितृ: देवो भवः कहा है बल्कि इन्हें ही प्रथम पूज्य देव तथा श्रेष्ठ माना है। क्या हम इनकी अवहेलना करके भौतिक या आध्यात्मिक सुख पा सकते है ? नहीं हम यह जान ले कि समस्त उन्नति के मूल का भंडार इनके प्रति हमारी सेवा ,कर्तव्य व् अनन्य श्रद्धा में ही समाहित है ।

भारतीय सांस्कृतिक आर्यस परम्परा में गया श्राद्ध का बड़ा ही महत्व है। हमारा भारतवर्ष तीर्थों का देश है एवं तीर्थो कि अपनी अनन्त महिमा है । वे मानव को पवित्रता ,प्रेम और शांति से भर देती है। ये तीर्थस्थल हमारे जीवन में नूतन चेतना और स्फूर्ति का संचार करते है। यह हमारे ऋषियों-महर्षियो,संतो, महात्माओ के तपः स्थल रहे है ।तीर्थ ज्ञान और भक्ति के केंद्र रहे है ।यह तीर्थ परम्परा की देन है। अद्भुत आदर्श पूर्ण जीवनी से ओत-प्रोत भारत के गौरव ज्ञान का रहस्य छुपा मिलता है।

अपनी भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में गया तीर्थ की अनंत महिमा है इनमे भी भौगोलिक,आध्यात्मिक एवं धार्मिक कारण है । चारो ओर से पर्वत मालाओ से घिरा हुआ यह नगर फल्गु गंगा के तट पर बसा है यह फल्गु सतत प्रवाहित अंतः सलिला से संबोधित है ।दक्षिण मध्य में भगवान् विष्णु का विशाल प्रांगण और मंदिर है मंदिर परम दर्शनीय एवं चमत्कारी और तथा प्रभावकारी है ।गर्भगृह में श्री विष्णु पाद की चरण प्रतिष्ठा है। फल्गु किनारे पर बसा यह विशाल एवं अति प्राचीन परम पावन मंदिर पितरों के श्राद्ध का केंद्र रहा है। यह परम्परा सनातन भारतीय संस्कृति में अति प्राचीन है कहिए तो सनातन है अनादि काल से यह कायम है ।यह कर्मकांड की विशिष्ठ पद्धति है , जिसमे श्रेष्ठ धर्म का अनुपालन करते है और परम्परा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते है  पौराणिक कर्म की चेतना हमें वेदांत की ओर अग्रसर करते है यह ऋषियों की सूझ रही है आज भी हमारा जीवन इन से आलौकित हो रहा है  घने कोहरे में भी मार्ग मिल रहा है श्राद्ध कर्म की अपनी एक अद्द्भूत महिमा है श्राद्ध पितरो के प्रति श्रद्धा पूर्वक किये जाने वाला एक आत्मदान है जो आत्मलब्धि का एक विशिष्ट साधन है हम जिन पितरों के प्रतिनिधि है ,उनके प्रति हमारा आत्म दान ही श्राद्ध कर्म का प्रायोज्य है ।इसमें जीवन का मांगल्य  और मूल धर्म की चेतना निहित है पिंडदान आत्मदान का प्रतीक है व्यष्टि की समष्टि में समाहित होने की क्रिया संपन्न होती है। यथा पिंडे तथा ब्रह्माण्डे।  पिंडदान का अर्थ बोध अतिव्यापक है श्राद्ध लोककल्याण की भावना  से अनुरंजित और अनुप्राणित है   जीवन कृतार्थ होता है ।यह परम्परा रामायण एवं श्रीमद्भागवत गीता से अनुमोदित है जो वेदों का सार है।

सौजन्य : पुरोहित चेरिटेबल ट्रस्ट

पुरोहित अजीत तिवारी वैदिक