विजय बाबा "मिश्रा"

विजय मिश्र बाबा
पटना , बिहार
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार आ सामाजिक कार्यकर्ता बानी  )

पटना: बिहार की राजधानी पटना में बैठ कर देश की राजनीति का हाल लेना आसान नहीं है। पर अखबार, समाचार के इतने माध्यम है कि यह आसान हो जाता है। उसके साथ साथ कई मित्र शुभचिंतक हैं जो स्थितियों परिस्थितियों को साझा करते रहते हैं। भले लोग कहें अखबार बिक गये, बिके हुए है पत्रकार, पर मैं कहता हूँ अभी भी सच के दिए में तेल डालने वाले हैं तैयार। खैर हमारा एक पडोसी राज्य अभी अभी नए कलेवर में कुछ नया करने के उत्साह के साथ बड़ी निठाह प्रण लिए तैयार हुआ है। नई सोच के साथ एक के बदले तीन तीन प्रदेश सेवकों की फौज सब कुछ ठीक कर देने का दावा और भी न जाने क्या क्या।

पर हालात में कोई बदलाव तीन माह के बाद नहीं दिख रहे हैं। लोगों के उत्साह का पारा गिरने लगा है। कुछ नए नए संगठन और भी मुखर होने लगे हैं। ठंढई की आशा में फिर से कड़वी घूंट का स्वाद लोगों के सपनों को फिर से टूटने का भ्रम पैदा करने लगा है।
कहते हैं ..

मत कर तपिश की बात, के भीतर जलता है।
भूख के चूल्हे पे न जाने क्या क्या उबलता है ।।

देश अच्छे दिन के आस में है और उत्तरप्रदेश सच्चे दिन के। भ्रष्टाचार और भय मुक्त शासन के नारे के साथ योगी द्वारा प्रदेश के मुखमंत्री पद की शपथ लेते ही इलाहाबाद में अपराधियों के तांडव ने क़ानून व्यवस्था को धता बताते हुए पूर्व ब्लॉक प्रमुख की हत्या कर अपने मनसूबे स्पष्ट कर दिये। उसके बाद लगातार जिस सिलसिलेवार तरीके से बलात्कार, लूट, हत्याओं का सिलसिला जारी है। उसने प्रदेश सरकार के दावे की पोल खोल दी है।

लोगों के मन में ये बात घर करने लगी है, ना जाने वह कौन सी बेबसी है जो मुख्यमंत्री को अपराधियों पर कार्यवाही नहीं करने दे रही है। दूसरी तरफ लोगों में इस बात का गुस्सा है कि मीडिया भी सरकार की गोदी में बैठ कर सच पर पर्दा डाल रही है। जिस बात को दिखाने का निर्देश दिया जा रहा, सरकार जो चाहे जितना चाहे उतना ही दिखाया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह दिखाया जा रहा जैसे लगे की सबकुछ होने के बावजूद कुछ नहीं हो रहा है। लोगों को फीलगुड कराने का ये तरीका सरकार और उसके इकबाल पर प्रश्न खड़े कर रहा है। लोग प्रदेश के हों या देश के किसी भी सरकार को इस लिए चुनते हैं कि वो इंसाफपसन्द, सच्ची, न्याय पसन्द हो जिससे लोग और संस्थाएं स्वेच्छा से रहें और कार्य करें। पर शायद लोगों की सोच को झटका लगा है क्योंकि इस सरकार में भी डराने वाले सक्रिय हैं। कोई आवाज़ ना उठा सके इस पर सख्ती दिख रही है जिससे लोग मानसिक उत्पीड़न जैसा महशुश कर रहे हैं।

दूसरी तरफ भाजपा पर पहले धर्म व मज़हब का ठेकेदार होने का ठप्पा लगा था। अब तो दलित आंदोलन के मुखर होते ही दलितों ने भी मोर्चा खोल विरोध शुरू कर दिया है। इस नए विरोध का कारण चन्द्रशेखर आज़ाद को आतंकवादी बना के पेश किया जाना, लखनऊ में छात्रों द्वारा विरोध किये जाने पर उन पर गम्भीर धाराओं में मुक़दमा करके उन्हें जेल में डाला गया, शेरपुर को दूसरा हाशिमपुरा बनाने की साजिशें चल रही हैं। इसी कड़ी में इंसाफ के मुद्दों पर मुखर रहने वाली सच्चाई के लिए अत्याचार के खिलाफ लड़ने वाले एक और नेता रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शोएब को भी नोटिस तामील कराई गई।

प्रश्न ये है कि तीन तीन महारथियों को ये बात समझना पड़ेगा कि ज़ुल्म व ज़्यादती में सच्चाई की आवाज़ दब रही थी। जिसके कारण जो भी इंसाफपसन्द लोग थे उन्होंने परिवर्तन को तरज़ीह दिया। उनकी भावनाओं को समझना और उसे साबित करना होगा। किसी को जेलों में डालकर सत्ता चालाने और उसे बचाने में कामयाब हो सकते हैं। पर लोकतंत्र में सबसे बड़ी भूल है। लोगों के दम पर तंत्र के शीर्ष पर बैठ अपने को महाराज समझने वाले को लोकतंत्र कभी माफ नहीं करता। लोगों की बात करके ही लोकतंत्र रूपी नाव को चलाया जा सकता है।