पटना, सियासी फैसले का आधार क्या है अब तक इसका कोई लिखित सिद्धांत नही है। पर हर बार फैसले का कारण जनहित ही कहा लिखा या बताया जाता है। छठी बार मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार ने एक बार फिर से अपने अंतरात्मा की बात में जनहित को लक्ष्य में रख फैसला लेने का हवाला दिया। पर हर बार की तरह इस बार के फैसले में पहले वाले नीतीश कुमार के चेहरे पर जो फैसला लेने के बाद चमक और आत्मविश्वास रहती थी उसका अभाव दिखा।

एक पत्रकार होने के नाते चीजें जो सामने से दिखती है उसके तह में जाने, हाव भाव और भावभंगिमा का विश्लेषण करना पत्रकारिता का हिस्सा है। बॉडी लैंग्वेज और स्वर में तालमेल का अभाव था नीतीश कुमार के इस बार के फैसले में। शायद जल्दबाजी में लिया गया था या पूरी तरह से इस फैसले में उनका स्वयं का नही किसी अन्य के प्रभाव से जन्मी परिस्थिति थी ऐसा अलग रहा था।

इस जल्दबाजी में लिए गए फैसले और उसे स्थापित करने का असमंजस साफ सेफ दिखई दे रहा था। बात सदन में वाद विवाद पर आते ही पूरी तरह खुल गई। नीतीश कुमार अपनी ही कही बातों में घिरते चले जा रहे थे। ये साफ साफ दिखा की जिस नीतीश कुमार के फैसले हर बार विरोध करने वाले और उनके विरोधियों को निरुत्तर कर दिया करते थे। इस बार के फैसले ने एक नौजवान को नेता बना उनके सामने खड़ा कर दिया जिसके प्रश्नों का सही और वाजिब उत्तर नही मिल सका।

दूसरी तरफ अपनी बात को सही साबित करने में नीतीश कुमार अपने स्वभाव के विपरीत इस बार झूठ का भी सहारा लेने को मजबूर हुए। कांग्रेस सूत्र से हुई ऑफ द कैमरा नीतीश की कई बातें झूठ और मनगढंत लगी। हर बार की तरह नीतीश कुमार सदन में सहज नही दिख रहे थे। जिस तरह संबोधित कर रहे थे उनके चेहरे पर एक अजीब सा भय दिख रहा था। एक खीझ थी जिसने अहंकार या यूं कहें कि जबरदस्ती किसी तरह इस चौतरफा हमले से निकलने की हड़बड़ाहट थी। शांत और अपनी बात को सहजता से रखने वाले नीतीश कुमार के संबोधन में झल्लाहट साफ दिखाई पड़ रही थी। यही कारण था कि एक युवा नेता तेजस्वी यादव का कल विधान सभा मे एक नेता के रूप में स्वीकार्यता मिली।

जिस तरह से कल तेजस्वी ने तथ्यों को शांत और बिल्कुल तरीके से एक मंजे हुए नेता की तरह रखा उसे नज़रअंदाज़ नही किया जा सकता है। सदन के बाहर और भीतर पहली बार नीतीश कुमार को असहज देखा गया। एक तरफ राजद तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने भी कुछ ऐसे तथ्य रखे जिसका जवाब नीतीश जी के पास नही था। कांग्रेस ने तो यहां तक कहा कि सम्प्रदायिक शक्तियों के साथ लड़ना सबके बुते में नही है। सत्ता और कुर्सी का मोह जिसे हो वो आवाम की लड़ाई नही लड़ सकता है। नीतीश कुमार को नेता मान पूरे विपक्ष ने एक स्वर में उन्हें सम्प्रदायिकता के खिलाफ बड़ी लड़ाई का नेता मान लिया था। पर उनके पिछले इतिहास को देखने पर इस जिम्मेवारी के लिए वो कहीं से फिट नही बैठते हैं। उन्होंने लड़ाई से पहले ही खुद को उन्हीं शक्तियों के साथ जोड़ लिया जिसकी जनता ने कभी अपेक्षा नही किया था। पुछले तीन चार सालों में हर लड़ाई को जिसे विपक्ष ने लड़ा उसके मूल में नीतीश कुमार को डिफेंस करना था। कांग्रेस नेता ने कहा कि सत्ता और कुर्सी के लिए कोई अपने उसूलों के साथ इस स्तर तक गिर कर कैसे समझौता कर सकता है यह आश्चर्य और सदमे की बात है।

इन सभी बातों के साथ जहां तक मैंने नीतीश कुमार का पिछले तीन दिनों में आंकलन किया है। वो बोल भले रहे हैं कि उनके अंतरात्मा की आवाज है या इनके पास कोई विकल्प नही था यह सहज स्वीकार्य नही हो रहा है। भाजपा के साथ जाना बिहार के हित मे हो सकता है। पर बिहार के माहौल और जनमत के हिसाब से शायद यह जल्दबाजी में लिया गया फैसला साबित हो। वक्त हर जख्म को भर देता है बिहार की सियासत में जो कुछ घाव और खरोंच लगे हैं वो भी वक्त भर देगा। हां कुछ बातों का सबको इंतजार रहेगा जो इस फैसले के कारण के रूप में रखा गया है। वो है सबका साथ सबका विकास, न्याय के साथ विकास व दो दो इंजन से अब एक समान पटरी पर तीब्रता से प्रदेश का विकास। इस लक्ष्य को कब तक पूरा किया जाता है इसका इंतजार होने लगा है।