भोजपुर,  प्रारब्ध आराा के चन्दवा में वन रहे चतुर्मास यज्ञ में जियर स्वामी ने कहा कि नित्य कर्म एवं नैमित्तिक कर्म का विशेष महत्व है। प्रतिदिन नित्य कर्म से ही अपनी दिनचर्या का शुभारंभ करना चाहिए। नित्य कर्म के बिना दिनचर्या प्रारम्भ करना दोषयुक्त होता है। विशिट लक्ष्य या कार्य विशेष के निमित्त किया गया कर्म नैमित्तिक कर्म है। श्री लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी आगे कहते हैं कर दर्शन और भूमि वंदन से हो दिनचर्या की शुरू करे। नित्य और नैमित्तिक कर्म का जीवन में अति महत्व है। प्रतिदिन सूर्योदय से 45 मिनट पहले जगें आपको स्वयं लाभ समझ मे आ जायेगा।

श्री जीयर स्वामी ने श्रीमद् भागवत महापुराण कथा के तहत भगवान विणु द्वारा राजा पृथु को उपदेश दिये जाने की बातें बतायीं। स्वामी जी ने नित्य कर्म की चर्चा करते हुए कहा कि शास्त्रों में कहा गया है कि सूर्योदय से पैतालिस मिनट पहले ब्रù मुहूर्त में जगना चाहिये। सबसे पहले तीन बार ‘श्री हरिः, श्री हरिः श्री हरिः‘ का उच्चारण करना चाहिये। श्री हरि का स्मरण करते हुए प्रार्थना करनी चाहिये। रात में सोने की स्थिति में कोई अपराध हुआ हो तो प्रभु क्षमा करेंगे। उसके बाद कर (हाथ) दर्शन ‘‘कराग्रे वसति लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती करमूले तु गोविन्दः प्रभाते कर दर्शनम् ‘‘इस मंत्र के साथ करना चाहिये। मंत्र याद नहीं रहने की स्थिति में कर के अग्र भाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती एवं मूल में नारायण का वास मान हाथ का दर्शन करना चाहिये। इससे लक्ष्मी, सरस्वती और गोविन्द की कृपा होती है। रावण के पास लक्ष्मी और सरस्वती दोनों थीं, लेकिन गोविन्द नहीं थे। इसलिये उसका नाश हो गया। इसके बाद पृथ्वी को तीन वार प्रणाम करके, जो नासिका चले वही पैर पहले भूमि पर रखना चाहिये। इससे दिशा शूल का दोा भी मिट जाता है। तत्पश्चात बारह बार कुल्ला एवं हाथ-मुंह धो कर हाथ में जल लेकर अजपा ज्ञायत्री मंत्र का संकल्प लेनी चाहिये, ताकि चैबीस घंटे में 21,600 बार चलने वाले श्वांस के द्वारा संकल्पित मंत्र ‘हंसः‘ का फल प्राप्त हो। उसके बाद भगवान के चैदह भक्तों प्रह्लाद, नारद, परासर, पुण्डरिक, व्यास, अम्बरीा, शुक, सौनक, भीम, दालभ, रूकमांगद, अर्जुन, वशिट और विभिण का नाम लें। साथ ही पंाच पतिब्रता अहिल्या, द्रौपदी, तारा, कुंती और मंदोदरी का नाम लेनी चाहिये। उन्होंने कहा कि नैमित्तिक कार्य वे हैं, जिन्हें विशिट निमित्त या पर्व को ध्यान में रखकर किया जाता है। नैमित्तिक कार्य पहले किसी कारण के उपस्थित होने के कारण होता है। नित्य और नैमित्तिक कार्य को छोड़ दूसरा कार्य निरर्थक होता है। इन दोनो के वगैर भोजन का कर्म भी अति नीच कहलाता है। स्वामी जी ने कहा कि आज धर्म निरपेक्षता की बात दिग्भ्रमित करने वाला है। उसे व्यवहार में नहीं लिया जाता है।

स्वामी जी कहते हैं सनातन धर्म में जितना अधिक धर्मनिरपेक्षता का समावेश है, उतना अन्य धर्मों में नहीं। धर्म को खंडित होने से बचाना ही धर्म निरपेक्षता है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस धर्म की हत्या होती है, वह धर्म भी जीवों की हत्या करता है। यदि धर्म की रक्षा की जाती है, तो वही धर्म जीवों की रक्षा करता है।

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