पटना, आज आपको हौसले की एक अनोखी हक़ीक़त से परिचित करा रहे हैं। हिमाचल के चंबा जिला में मंजीर है वहां के सरकारी स्कूल राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला में काम करते शामदीन। अगर कहा जाए तो इस विद्यालय के शिक्षकों से ज्यादा प्रेरणा बच्चे इनसे लेते हैं। शामदीन का बचपन से ही दोनों हाथ और एक पांव नहीं हैं। अपने जज्बे और हौसले से इन्होंने चतुर्थ वर्ग में चपरासी की नौकरी हासिक किया और अपनी सेवा से सभी को संतुष्ट रखते हैं।

पहाड़ और पथरीली राह को कभी रोड़ा नहीं बनने दिया अपनी कर्मठता के सामने।

शामदीन के घर से स्कूल की दूरी सात किमी.है, पर कभी भी अपनी ड्यूटी से गौरहाजिर नहीं हुए। इतने कर्तव्यपारायण हैं और अपने हिस्से की जिम्मेदरी इतनी बखूबी निभाते हैं कि घर से स्कूल तक की दूरी तय करने के लिए उन्हें करीब सात किलोमीटर का सफर रोज तय करते है। पहाड़ी और पथरीली राह पर कभी भी अपनी दिव्यांगता को हावी नहीं होने दिया। मुश्किलों से भरे इस राह को वे चीता जैसी फुर्ती से पूरी करते हैं। स्कूल में वे सबसे पहले पहुंचने वाले कर्मचारी भी वही हैं। दोनों हाथ के दिव्यांग होने के बावजूद स्कूल कर हर कमरे ताला स्वयं बिना किसी के मदद खोलते हैं। आम आदमी की तुलना में उनकी चुस्ती फुर्ती का हर कोई कायल है। शामदीन स्कूल के प्रिंसिपल, स्टाफ और स्कूल के बच्चो का हर काम करते हैं, जिसे एक आदेशपाल के रूप में उन्हें बताया जाता है। इतना ही नहीं शामदीन लिखने-पढ़ने का काम भी अच्छी तरह से निपटा लेते है।

कंधों पर जिम्मेवारी का बोझ कैसे बाखूबी उठाया जाता है शामदिन उसके मिशाल हैं।

शामदीन हिमाचल के सलूणी गाँव के रहने वाले है। शादीशुदा हैं बूढ़े मां-बाप, पत्नी एवं पांच साल के पुत्र तथा तीन साल की पुत्री की जिम्मेवारी का भलीभांति निर्वहन करते है। इस कर्मठता का श्रेय वो अपने मां—बाप को देते हैं। अपने पिता-माता को धन्यवाद देते हुए वे कहते हैं कि बचपन से ही उनके दोनों हाथ और एक पांव नहीं है पर’मां—बाप ने मुझे इस बात का कभी ऐहशास नहीं होने दिया। कठिनाई से लालन पाला करते हुए मेरे हौसले को हमेशा बनाए रखा। आज उन्हीं माता पिता के दिए शक्ति प्रेरणा और जज्बा से मैं ईश्वर के दिए इस दिव्यांग शारीर के बावजूद कभी भी असहाय नहीं महशुस करता हूँ।

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